Monday, 18 September 2017

मेरा संस्मरण

बात निकलेगी तो दूर तलक जाएगी
इक नजर उठेगी गुजरे हुए  सालों  की तरफ
उंगलीया उठेंगी  रूखे हुए बालों की तरफ
लोग जालिम हैं। हर एक बात का ताना देंगे
बातों बातों में मेरा जिक्र  भी। ले। आएंगे
          भाई सच्चाई यह हैकि जबतक दुख रहताहैं
इंसान का माइंड्स। दुख से छुटकारा पाने के प्रयास में लगा रहता है। उस। काल में उसे दुख का अहसास भी
नहीं होता । पर  कालचक्र के अनुसार जब सुख मिलता है  तो वह बीता दुख और उस समय की मेहनत दिल पर प्रहार करती है ।
पर बड़े दुख की बात थी कि। भरे। पूरे घर में किसी कोभी मेरी पीड़ा से मतलब नहीं था ।माता पिता का दिया हुआ दंड मैं घुट घुट कर भोग रही थी।किसी। कोभी सहानुभूति देने की बुद्धि नहीं थी । सारे मेरी कमी निकलते थे । जैसा। जीवन मुझे। भेट में मिला था खानदान मेँ कोई सोच भी नहीं सकता ।।मेरे बाप ने ऐसा वर  ढूंढा। बिजली के खंभे जितना लम्बा।  मुझसे दस साल बडा। गरीब शक्की लालची ।उसके सुपुर्द कर दिया मुझे । उसने मुझे स्वीकार किया अपने घरवालों की गरीबी मिटाने के लिए । पर वह सपना पूरा न कर पाया।और नतीजा यह निकला उसने मुझे कूड़े का कनस्तर बना लिया ।
में अब अपने प्रयासों से सूखी हूँ मुझे अब किसी की सहानुभूति या। प्रेम का दिखावा नहीं चाहिए ।

Friday, 9 September 2016

duniyan jaadu ka khilauna

।जगजीत सिंह ने  एक  गीत  लिखा है  आपने भी  सुना होगा  वह है 
दुनियां जिसे कहते हैं  जादू का  खिलौना  है   ।
मिल जाये तो मिटटी है  खो  जाये  तो  सोना है ।
वास्तव में यह हम सबका अनुभव है कि जिस पदार्थ  या  व्यक्ति के लिए हम जितने अधिक ललायित रहते हैं कि वह हमें किसी तरह मिल जाये और जब तक नहीं मिलती दिल में बड़ी तडप रहती है ।  परन्तु जब वह मिल जाती  हैतो एक  आदि दिन तो ठीक से निकल जाता है पर जल्दी ही  उसका  आकर्षण समाप्त हो जाताहै । तत्पश्चात् वही चीज  तकलीफ  देने लगती है  हम उससे  छुत्कारा  पाने के लिए  प्रयत्न  करने  लगते हैं । इस बात को समझने के लिए एक  कहानी है ।
                 एक बार कोई संत महात्मा  पागल  खाने का  मुआयना करने गए ।
पागल खाने में सभी  लोग  बड़े   सु संस्कृत ढंग से मिले । बड़ा   साफ़ सफाई  का ध्यान  रखा  जाता था । वहां एक खिड़की  में  एक  व्यक्ति  एक  तस्वीर लिए  बैठा था ।बड़ा  निराश हताश सा । उसके बाल  बिखरे हुए  थे   वह  बार बार  उस तस्वीर को  छाती से लगता  और देख देखकर  जोर जोर से रोने लगता ।  निरीक्षक से पूछने पर  बताया की जिस लड़की की यह तस्वीर है वह इसकी प्रेमिका थी  ।वह इसे नहीं किसी औरसे  शादी करके चली गई । अब यह उसके विरह में  पागल हो गया है ।
घूमते घूमते वह संत एक दूसरी  खिड़की तक गए  देखा एक आदमी छाती  पीट पीट कर रो रहा है। एक तस्वीर  इसके हाथ में भी है जिसे  देखकर यह  बाल नोंचने लगताथा । पूछा  यह  ऐसा  क्यों कर रहा है  बताया  कि जिस  लड़की का
फोटो  देखकर यह रो रहा है  वह  इसकी  पत्नी है  । और जो निराश बैठा रो रहा हैउसकी यह  प्रेमिका थी । जो उसे  मिली नहीं ।
                    तो यह है संसार का खेल । यहाँ कोई भी  तृप्त नहीं है ।किसी को बैगन  बाबरे  किसी को बैगन  पथ्य ।* मतलब  अपने  दृष्टि कोण के  मुताबिक संसार की  घटना अच्छी या  बुरी  दिखाई  देती  है । राम चरित  मानस में   तुलसीदास ने  लिखा है    * उमा कहूँ मैं अनुभव अपना  । सत हरी भजन जगत सब सपना । *   इस संसार में जोभी वास्तु दिखाई  देती है नश्वर हैं। आज है कल्
नहीं । मनुष्य का जीवन ही धुप छाया की  भान्तिसुख दुःख के  भंवर में फंसा है
हमारा  शरीर जो हमें बड़े  भाग्यों से मिला है  वह  रोगों का घरः  है ।कितना भी  पुष्टकारक भोजन खिलाओ   कितना भी  सजाकर  रखो समय के साथ  जर्जर  हो  जाता है ।  यही नहीं संसार का  कोई भी पदार्थ   वस्त्र आभूषण  सोना  चाँदी  लोहा अन्य  धातुएं सभी  सँभालते  सँभालते क्षय को  प्राप्त  होते रहते हैं ।
                     मनुष्य की   इच्छायें आसमान जैसी असीमित  है  एक  पूरी होती है दूसरी समस्या  सामने  आजाती है ।  मैं मेरा  हमारा कहते कहते  हम  संसार से विदा  हो जातेहैं  । और  यह धन दौलत  पद प्रतिष्ठा  घर   मकान  दुसरे के  हाथ  चले  जाते  हैं ।  कौड़ी कौड़ी  करके  जोड़ा हुआ  धन  बैंक में ही  रखा रह जाता है ।    मनुष्यों !यह काल की  बलिहारी है । काल निमिष मात्र में किसी  चीज   को  उत्पन्न कर  सकता है और तत्क्षण  विनाश भी कर देता है ।    अच्छे  बुरे  कर्मों के  हिसाब से यह शरीर सुन्दर या कुरूप  काल ही  उत्पन्न करता है ।
काल  ही  रक्षक है  काल ही  संहारक है ।बुढ़ापे में शारीर के   जर्जर हो जाने पर  काल  की प्रेरणा से  ही प्राण शरीर छोड़ता है । अन्तमें  इस संसार में ऐसा कोई उपाय नहीं हैजिसका सहारा लेकर  जीवन को  मंगलमय बना सकें  । क्योंकि  प्रतिक्षण काल  परिवर्तित होता रहता है ।  
             इस   ब्रह्माण्ड में एक अखंड  चिन्मय पुरुष के  और कुछभी  स्थाई नहीं है । *लहलहाती फसल मेरे  खेत की ,थोड़ी   अन्दर  थोड़ी  बाहर देखिये ।
झूठ  हँसता  दिख रहा है खेत  में, सच के खाते में है  बंजर    देखिये  ।* 
            हम  हजार  उपाय करे कि  धन मिल जाय तभी हमें सुख  शान्ति   
  मिलेगी । पर  यह  हमारा भ्रम  है  । जैसे  अंजली  में  भरा  जल  धीरे धीरे  रिस   जाता है ऐसे ही संसार का माया जाल  है ।पुत्र हो जाय  कीर्ती मिले स्वस्थ्य  हो
जाएँ , शरीर  सूदृढ हो जाय  लम्बी उम्र हो   जाए    आदि  इच्छाएं यदि पूरी हो भी  जाएँ तो  भी  वस्तुत:जितनी चीजें मिलती जाएँगी  उतनी ही अशांति सघन होती  जाएगी । क्योंकि  हर सुख के  पीछे  दुःख  छिपा है ।
         एक नजारा देखिये  -------  जिनके  महलों में हजारों रंग के  फ़ार्नूस थे
            झाड उनकी  कब्रों पर हैं और   निशां  कुछ भी नहीं  ।
संत जन  कहते हैं कि  संसार  को  देखो  । आसक्त  मत होजाओ यही  सुखी  रहने का उपाय है ।  दुनियां  है कर्म  भूमि  कोई  सैरगाह नहीं ।
     जहाँ था जमशेदी  दरबार    शान से  होता था मधु  पान ।
    जहाँ स्वच्छंद   घूमते थे  सिंह , वही अब  स्वच्छंद  घूमते  श्वान ।

Thursday, 8 September 2016

vidai geet chalo musafir apne ghar

हमको जाना अपने  गाँव  सबको  राम राम राम सबको राम राम राम  ।
सबको राम राम राम सबको राम राम राम ।
यदि कोई भूल हमसे हो उसे तुम माफ़ कर देना ।
अनाड़ी   मूर्ख की बातें  नहिं  तुम  ध्यान में रखना ।
प्रिय जन से  बिछुड़ने पर मेरा ये आखिरी पैगाम ।
सबको राम राम राम सबको राम राम राम ।
लेलूं  अलविदा   सबसे  हुकुम  ये  काल का  आया
चलूं इकबार  मुख को मोड़ जगत की है यही माया।
भुलाना मुश्किल  सबका प्यार करती  आखिरी  सलाम ।
सबको राम राम राम सबको राम राम राम ।
यहीं फिर लौट कर आयें जन्म जब दूसरा पायें
नये  नये भाई  बन्धु पायें  नहीं कोई दूसरी  राहें ।
बेटा बेटी  भाई भाभी  सब  परिजन  को प्रणाम  ।
सबको  राम राम राम सबको राम राम राम  ।

                                                                   रचियता   ओशो  शैलेश ।

Sunday, 6 September 2015

परोपकारी व्यक्ति welwisher

औरों के  हित जो  जीता है ।औरों के हित जो मरता है ।
उसका  हरप्रयास   रामायन  प्रत्येक कर्म ही गीता है ।
जो सहज   समर्पित  जनहित में,  होता है  स्वार्थ त्याग करके ।
जिसके पगतल चलते रहते  दुःख दर्द मिटाने  घर घर के ।
वही है शंकर  जो  औरों की वेदना निरन्तर पीता है ।
              जिसका  चरित्र  गंगाजल  सा है, बुद्धि विमल  पावन  उज्जवल
             जिसके उर से सद भावों की धरा बहती है कल कल ।
             वह है लक्षमण जिसने हर नारी  को समझा सीता है ।
जिसका  जीवन संघर्ष बना औरों की गहन समस्या है  ।
जग में प्रकाश फैलाना ही जिसकी आराध्य  तपस्या है ।
जो प्यास बुझाता  जन जन की वह पनघट कभी न रीता है ।
               जिसने जग के मंगल को ही  अपना जीवन  व्रत  मान  लिया
                इस व्यापक्  जग के कण कण में भगवान तत्व पहिचान लिया
               उस  आत्मा का सौभाग्य अटल  वही  प्रभु की  परणीता है।

Saturday, 5 September 2015

कठिन समय

जिसने  मरना  सिख  लिया है  जीने का अधिकार  उसी को ।
जिसने  काँटे पार किये हैं फूलों का उपहार  उसी को  ।
जिसने विकास के गीत संजोये  तलवारों  के झन झन स्वर पर
जिसने  सातों राग अलापे  रुन  झुन  गोली  के  बरसन पर ।
जो है बलिदानों का प्रेमी  जगती का उपहार उसी को 
जिसने  कांटे पार कर लिए फूलों का उपहार उसी को ।
                जो  हँस हँस कर और  मस्ती लेकर  जिसने सीखा है  बलि होना
               अपने कष्टों पर मुस्काना औरों के  दुखड़ों पर रोना 
          जिसने  सहना  सीख  लिया  है  संकट  हैं  त्यौहार उसी के  
            फूलों  का उपहार उसी को ।
ओ  दुर्गम   बीहड़  पथ का पंथी ,जोन कहीं भी रुक कहीं पर
अपने तन पर  घात सहे पर जो न कहीं भी रुका कहीं पर ।
झुका रहा है  मस्तक अपना ये सारा संसार उसी को ।
  जो  काँटों पर चलना सीखा  फूलों  का उपहार  उसी को ।
--------------------------------------------------------
साहसी को बल मिला हैं  म्रत्यु ने मारा नहीं है
राह ही  हारी  सदा है राही कभी हारा नहीं है
जो  व्यथायें प्रेरणा दें उन  व्यथाओं को  दुलारों
जूझकर  कठिनाइयों से  रंग  जीवन  का  निखारो ।
बृक्ष कट कट कर   बढ़ा है दीप बुझ बुझ कर  जला है ।
मृत्यु से  जीवन  मिले तो  आरती  उसकी उतारो ।

कृष्ण की याद में विरह गीत Miss you krashn ji

ब्रज की  कहें सब सखियाँ  कहें  सब सखियाँ  हाय  श्याम सुन्दर से लग गईं अखियाँ ।
जाते समय ये कहा था मोहन ने , परसों ही  आऊंगा मैं मधुबन में ।
पल भर में भूले सूरतियाँ हाय  श्याम सुन्दर से लग गईं अखियाँ । 
      रोते हैं नयना  जिया घबराये  , वो तान मुरली की फिर से सुनाये
    हमसे करीं श्याम घतिया   हाय श्याम सुन्दर से लग गईं अखियाँ ।
             किसको सुनाएँ अपनी कहानी  , हम तो हुईं श्याम  तुम पर दीवानी
             लिख लिख  भेजें पतियाँ हाय श्याम सुन्दर से लग गईं अखियाँ ।
---------------------------------------------------------
                 कृष्ण जन्म पर  माँ देवकी की  मनोस्थिति
                -------------------------------
गोकुल को रवाना करूं मैं तुमको  कन्हैया
लेकर चले वासुदेव जी  रख  सूप  में  छैया  
खाकर पछाड़  गिर पड़ी वो  देवकी  मैया  ।
यमुना  अथाह बह  रहीं बड़े वेग से दैया
ऊपर स  मेंह बरस  रहा    चारों  ओर  से मैया ।
यमुना  का  जल  बढ रहा  छूवन  चरण  चैया
तब  शेष ने  छाया करी  गोकुल  पहुंचे कन्हैया
           नन्द के आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की
          हाथी  दीन्हे  घोड़े  दीन्हे  और दीन्ही  पालकी ।जय कन्हैया लाल की